विश्व गुरु से पीछे छूटने तक: भारतीय शिक्षा व्यवस्था का इतिहास, चुनौतियाँ और सुधार की राह
1. भूमिका (Introduction) – भारत का गौरवशाली इतिहास शुरुआत इस बात से करें कि भारत कभी दुनिया में शिक्षा का केंद्र था। एक समय था जब दुनिया भर से लोग पढ़ने के लिए भारत आते थे। तक्षशिला (Taxila) और नालंदा (Nalanda) जैसे विश्वविद्यालय इसका प्रमाण हैं, जहाँ विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र और दर्शनशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। चिकित्सा में सुश्रुत और गणित में आर्यभट्ट जैसे दिग्गजों ने भारत की धरती पर ही जन्म लिया। लेकिन सवाल यह उठता है कि जो देश कभी दुनिया को शिक्षा देता था, वह आधुनिक समय में वैश्विक स्तर पर पीछे क्यों रह गया? आइए इसका निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय 2. पीछे छूटने के मुख्य कारण (The Historical & Systemic Reasons) औपनिवेशिक शासन (Colonial Impact): ब्रिटिश शासन (विशेषकर लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा नीति) ने भारत की पारंपरिक, व्यावहारिक और स्किल-बेस्ड शिक्षा प्रणाली को बदलकर उसे सिर्फ 'क्लर्क' या कर्मचारी पैदा करने वाली व्यवस्था में तब्दील कर दिया। रटने पर ज़ोर ( Rote Learning ): आज की व्यवस्था में सीखने से ज़्यादा 'मार्क्स' (अंकों) और रटने की प्रवृत्...