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राजगीर का मलमास मेला

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राजगीर का मलमास मेला हर साल नहीं, बल्कि हर तीसरे साल (प्रत्येक तीन वर्ष में) अधिकमास या मलमास के दौरान लगता है। सनातन धर्म और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य और चंद्र वर्ष के दिनों के अंतर को पाटने के लिए हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जुड़ता है, जिसे मलमास, अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। राजगीर का मलमास मेला हर साल नहीं, बल्कि हर तीसरे साल (प्रत्येक तीन वर्ष में) अधिकमास या मलमास के दौरान लगता है। सनातन धर्म और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य और चंद्र वर्ष के दिनों के अंतर को पाटने के लिए हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जुड़ता है, जिसे मलमास, अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।  राजगीर में ही इस पावन मेले के आयोजन और इसकी पौराणिक मान्यताओं के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं: 1. 33 करोड़ देवी-देवताओं का प्रवास  हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मलमास के पूरे एक महीने के दौरान 33 करोड़ देवी-देवता और सभी ऋषि-मुनि अपनी लोक छोड़कर राजगीर (प्राचीन नाम राजगृह) में वास करते हैं। इस समय देश के अन्य किसी भी हिस्से में कोई मांगलिक कार्य (जैसे विवाह या मुंडन) नहीं होते, क्योंकि ...

विश्व गुरु से पीछे छूटने तक: भारतीय शिक्षा व्यवस्था का इतिहास, चुनौतियाँ और सुधार की राह

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1. भूमिका (Introduction) – भारत का गौरवशाली इतिहास शुरुआत इस बात से करें कि भारत कभी दुनिया में शिक्षा का केंद्र था। एक समय था जब दुनिया भर से लोग पढ़ने के लिए भारत आते थे। तक्षशिला (Taxila) और नालंदा (Nalanda) जैसे विश्वविद्यालय इसका प्रमाण हैं, जहाँ विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र और दर्शनशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। चिकित्सा में सुश्रुत और गणित में आर्यभट्ट जैसे दिग्गजों ने भारत की धरती पर ही जन्म लिया। लेकिन सवाल यह उठता है कि जो देश कभी दुनिया को शिक्षा देता था, वह आधुनिक समय में वैश्विक स्तर पर पीछे क्यों रह गया? आइए इसका निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय 2. पीछे छूटने के मुख्य कारण (The Historical & Systemic Reasons) औपनिवेशिक शासन (Colonial Impact): ब्रिटिश शासन (विशेषकर लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा नीति) ने भारत की पारंपरिक, व्यावहारिक और स्किल-बेस्ड शिक्षा प्रणाली को बदलकर उसे सिर्फ 'क्लर्क' या कर्मचारी पैदा करने वाली व्यवस्था में तब्दील कर दिया। रटने पर ज़ोर ( Rote Learning ): आज की व्यवस्था में सीखने से ज़्यादा 'मार्क्स' (अंकों) और रटने की प्रवृत्...

बिहार का आइस एप्पल

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बिहार का 'आइस एप्पल': गर्मी का देसी अमृत, जिसे लोग 'तड़कुन' और 'ताड़ का कोवा' कहते हैं जब उत्तर भारत और खासकर बिहार में सूरज आग उगलने लगता है, तो शरीर को अंदर से ठंडा रखने के लिए प्रकृति हमें एक अनमोल तोहफा देती है। इस तोहफे का नाम है आइस एप्पल (Ice Apple)। बिहार की आम बोलचाल में इसे 'तड़कुन' (मैथिली), 'तड़गोला' (भोजपुरी) या 'ताड़ का कोवा' कहा जाता है। दिखने में यह बिल्कुल बर्फ के टुकड़े या पारदर्शी जेली जैसा होता है। आज के इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि बिहार का यह पारंपरिक फल क्यों हर सुपरफूड से बेहतर है। 1. क्या है तड़कुन (Ice Apple)? यह ताड़ (Palm) के पेड़ पर फलने वाला एक प्राकृतिक फल है। जब ताड़ के कड़े फल को ऊपर से काटा जाता है, तो उसके अंदर से तीन या चार पारदर्शी, मुलायम और रसीले कोवे निकलते हैं। इसके अंदर हल्का मीठा पानी भरा होता है, जिसका स्वाद काफी हद तक कच्चे नारियल पानी जैसा लगता है। 2. बिहार की संस्कृति और यादों से जुड़ाव बिहार के गांवों में गर्मियों की दोपहर का मतलब ही 'तड़कुन' होता है। * मई से जुलाई के महीनों में गांवों...

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)

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 कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) इस समय भारत के सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है। महज़ कुछ ही दिनों में इस डिजिटल मूवमेंट ने इंस्टाग्राम पर 2 करोड़ (20 मिलियन) से अधिक फॉलोअर्स का आंकड़ा पार कर लिया है, जो देश की बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों से भी ज़्यादा है। यह डिजिटल आंदोलन तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की एक टिप्पणी आई (जिसे बाद में उन्होंने गलत तरीके से पेश किया जाना बताया), जिसमें कथित तौर पर बिना डिग्री या बिना रोजगार वाले कुछ युवाओं की तुलना 'कॉकरोच' से की गई थी। इसके विरोध में अभिजीत दीपके नाम के एक डिजिटल स्ट्रेटेजिस्ट ने व्यंग्य (Satire) के रूप में इस 'पार्टी' की नींव रखी। हाल ही में सरकार की कानूनी मांग के बाद इसके एक्स (X) अकाउंट को ब्लॉक कर दिया गया और इसकी वेबसाइट भी बंद हो गई है, जिससे यह मुद्दा और गरमा गया है。 इस पूरे घटनाक्रम का निष्पक्ष विश्लेषण नीचे दिया गया है: 👍 क्या सही है? (सकारात्मक पहलू)युवाओं की आवाज़: यह आंदोलन भारत के युवाओं में बेरोजगारी, पेपर लीक, और शिक्षा व्यवस्था को लेकर पनप र...