I LOVE BIHARSHARIF
बिहारशरीफ (Biharsharif) भारत के बिहार राज्य के नालंदा ज़िले में स्थित एक नगर है। यह ज़िले का मुख्यालय भी है। इस क्षेत्र के लोग मगही भाषा बोलते हैं। यहाँ मगही बहुत ही प्रचलित भाषा हैं।बिहार शरीफ का रेलवे स्टेशन जक्शन बन गया हैं।बिहार शरीफ से एक रेलवे लाइन बरबीघा की ओर जा रहा हैं | बिहारशरीफ का पुराना नाम उदंतपुरी था और अब फिर इसका नाम उदंतपुरी किया जा चुका है अरे बदलाव अपने संस्कृति आवश्यकता है
बिहारशरीफ़ 10वीं शताब्दी में पाल राजवंश की राजधानी रहा था। यहाँ पर पाँचवीं शताब्दी का गुप्त काल का एक स्तंभ है और यहाँ मस्जिदें और मक़बरे हैं। बिहारशरीफ़ में एक विशाल बौद्ध बिहार (बौद्ध ज्ञान प्रतिष्ठान) ओदंतपुरी है, जिस पर बिहार का नाम पड़ा है। 1869 में इसका नगरपालिका के रूप में गठन हुआ था। पटना से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित बिहारशरीफ़ प्राचीन काल में मगध की राजधानी था। यहाँ पर भगवान बुद्ध ने उपदेश दिए थे। इसके निकट ही यहाँ बौद्ध काल का प्रसिद्ध नालन्दा विश्वविद्यालय था जहाँ दूर-दूर के देशों के लोग शिक्षा प्राप्त करने के लिए आया करते थे।
जलवायु
बिहार के अन्य भागों की तरह बिहारशरीफ में भी गर्मी का तापमान उच्च रहता है। ग्रीष्म ऋतु में सीधा सूर्यातप तथा उष्ण तरंगों के कारण असह्य स्थिति हो जाती है। गर्म हवा से बनने वाली लू का असर शहर में भी मालूम पड़ता है। देश के शेष मैदानी भागों (यथा - दिल्ली) की अपेक्षा हलाँकि यह कम होता है।
ग्रीष्म ऋतु अप्रैल से आरंभ होकर जून- जुलाई के महीने में चरम पर होती है। तापमान 46 डिग्री तक पहुंच जाता है। जुलाई के मध्य में मॉनसून की झड़ियों से राहत पहुँचती है और वर्षा ऋतु का श्रीगणेश होता है। शीत ऋतु का आरंभ छठ पर्व के बाद यानी नवंबर से होता है। फरवरी में वसंत का आगमन होता है तथा होली के बाद मार्च में इसके अवसान के साथ ही ऋतु-चक्र पूरा हो जाता है।
पर्व-त्यौहार
हिंदू महिलाएँ तीज, जीतीया, छठ आदि बहुत ही धार्मिक उत्साह के साथ मनाती हैँ.
दीवाली, दुर्गापूजा, होली, बसंत पंचमी, शिवरात्रि, रामनवमी, जन्माष्टमी हिंदुओं का महत्वपूर्ण लोकप्रियतम पर्वो में से है, जबकि मुसलमानो का महत्वपूर्ण त्यौहार मुहर्रम, ईद और बकरीद है। छठ इस क्षेत्र के लिए सबसे पवित्र त्योहार है। इसका महत्व के रूप में यह धर्म के सभी बाधाओं को खारिज कर देता है देखा जा सकता है। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा भाव और भक्ति भाव से किए गए सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है।
खान-पान
आबादी का मुख्य भोजन भात-दाल-रोटी-तरकारी-अचार है। सरसों का तेल पारम्परिक रूप से खाना तैयार करने में प्रयुक्त होता है। खिचड़ी, जोकि चावल तथा दालों से साथ कुछ मसालों को मिलाकर पकाया जाता है, भी भोज्य व्यंजनों में काफी लोकप्रिय है। खिचड़ी, प्रायः शनिवार को, दही, पापड़, घी, अचार तथा चोखा के साथ-साथ परोसा जाता है।
संस्कृति
विवाह
अधिकतर शादियां माता-पिता के द्वारा ही निर्धारित-निर्देशानुसार होती है। विवाह में संतान की इच्छा की मान्यता परिवार पर निर्भर करती है। विवाह को पवित्र माना जाता है और तलाक की बात सोचना (मुस्लिम परिवारों में भी) एक सामाजिक अपराध समझा जाता है। शादियाँ उत्सव की तरह आयोजित होती है और इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भरमार रहती है। कुछेक पर्वों को छोड़ दिया जाय तो वास्तव में विवाह के अवसर पर ही लोक-कला की सर्वोत्तम झांकी दिखाई देती है। इस अवसर पर किए गए खर्च और भोजों की अधिकता कई परिवारों में विपन्नता का कारण बनता है। दहेज का चलन ज्यादातर हिंदू एवं मुस्लिम परिवारों में बना हुआ है।
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